देखता हूँ इस वसुंधरा पर शीश चढ़ाने कौन आता है

देखता हूँ इस वसुंधरा की प्यास मिटाने कौन आता है।

देखता हूँ इस वसुंधरा पर शीश चढ़ाने कौन आता है।

जिस मिट्टी की तन को लेकर

उस मिट्टी को भूल गए तुम,

जिस मिट्टी सा मन को लेकर

उस मिट्टी को भूल गए तुम,

देखता हूँ उस मिट्टी की कर्ज़ चुकाने कौन आता है।

देखता हूँ इस वसुंधरा पर शीश चढ़ाने कौन आता है।

कभी किसी ने खंजर डाला

कभी किसी ने लहू बहाये,

कभी किसी ने बाँटा इसको

कभी किसी ने पहरे लगाये,

देखता हूँ इस खंजर की दाग मिटाने कौन आता है।

देखता हूँ इस वसुंधरा पर शीश चढ़ाने कौन आता है।

यूँ ही स्नेह की बात न बोलो

तनीक अपने मन को भी टटोलो,

हार चुका है तू  जब सबकुछ

फिर बटुवे को तुम न खोलो,

देखूँ इस दुखती मंज़र की याद मिटाने कौन आता है।

देखता हूँ इस वसुंधरा पर शीश चढ़ाने कौन आता है।

कभी जो बारीश की बूंदें थीं

प्यास बुझाये थे इस तन के,

अभी वो अपने शीश झुकाये

बचा रहे हैं किस जीवन को,

इस भूतल पर बोझ बनकर देखूँ अब कौन-कौन आता है।

देखता हूँ इस वसुंधरा पर शीश चढ़ाने कौन आता है।

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

1 Comment

  1. It?s hard to find well-informed people in this particular
    subject, but you seem like you know what you?re talking about!
    Thanks

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