अभी मेरे इश्क़ में, और इम्तहान बाकि है।

अभी  मेरे  इश्क़ में, और इम्तहान बाकि है।
अभी  मुझमें, और थोड़ी सी, जान बाकि है।
क्या कहते हो, कि डूब गया हूँ मैं, पश्चिम में।
अभी तो पूरब का, सारा आसमान बाकि है।

कल निकलूंगा, कहीं और, मैं भोर बनकर।
अभी  मेरे,  कुछ  और,  अरमान  बाकि  है।
क्यों  कहते  हो,  कि  भूल गया हूँ  मैं,  तुम्हे।
अभी  तक  सीने  में, तुम्हारा  नाम बाकि है।

अंजाम मत सोच, लड़कपन की मुहब्बत का।
बस प्यार  किए  जा, जबतक  जान  बाकि है।
औरआएंगे  अभी,  मुहब्बत  की नसीहतें देने।
दिलजलों  से  भरे काफ़िले, तमाम  बाकि  है।

मेरे  बेपनाह  मुहब्बत   की   थाह,  क्या  ढूंढते  हो।
इसमें  अथाह  गहराईयों  की, एक जहांन बाकि है।
उम्मीदें मत हार, गर कश्तियाँ मझधार में दिखे तो।
तू  कर   कोशिश,   जब  तक  इम्तेहान   बाकी  है।

जहन  में  तेरी   याद,  चूभती   है, खंज़र  की  तरह।
सीने   में   तेरे   दिए   ज़ख्मो  के,  निशान  बाकि है।
कब  तक  भटकता  रहूं,  यूँ  ख्यालों  भरी  जहां  पर
आजाओ की मुझमें अभी, थोड़ी  सी  जान बाकी है।

लपेट कर रखा हूँ  मैं, तस्वीर तुम्हारी सीने से।
शायद, कुछ हकीकतों के दरमियान बाकी है।
इंतेज़ार-ए मुहब्बत में ज़ायर, हो गयी, ज़िन्दगी सारी।
लगता   है   अभी,   कुछ   और   इल्ज़ाम   बाकि   है।

लगता   है   अभी,   कुछ   और   इम्तेहान  बाकि   है।

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

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