बता ये इंसान क्या है

फिर कहीं, अदब से हाँथ उठीं, ज़माने की तरफ,
हर   शख्स   चल   पड़ा,  अनजानों   की   तरफ।
अचानक  राहें  बोल उठीं, कोई ठहरा  है  शायद,
तभी सारी  निगाहें मुड़ीं,  मेरी  निग़ाहों की तरफ।

कुछ यूँ बदल गए वो, जिन्हें मैंने बदलना सिखाया,
गिरते  रहें  वो  सभी, जिन्हें  मैंने  चलना  सिखाया।
अंजाम  मालूम  था  हर  किसी  को,  पहले  ही  से,
फिर भी वो  दौड़  पड़े, जिन्हें बस चलना सिखाया।

फिर क्यों  ना  हर  कोई,  इलज़ाम  मेरे मत्थते मढ़े,
वो  नाकाम  होते रहे, जिन्हें  मैंने  इतना  सिखाया।
जिन्हें   सिखाते -सिखाते,   सबकुछ  भूल  गया  मैं,
वो तलाशते रहे की, किसने उन्हें, गिरना सिखाया।

एक ख़ौफ़ सी बिखरी रहीं और इबादत होते रहे,
वो   महफ़ूज   साये   में   कुछ   यूँ   छिपाए  गए।
जहाँ  तक भी  निगाहें  गयीं, वो  दिखाई  देते रहे,
मैं सोचता रहा  की, कीसकदर  वो  छिपाए  गए।

तलाश किसकी है और ये सफर क्यों है,
पास सबकुछ है फिर ये बेखबर क्यों है।
बहुत  नादाँ  हैं  ये  बेबसी  में  पीनें वाले,
यूँ   पसीनो  से  तरबतर  शहर  क्यों  है।

बता  दे  कोई  मुझे की, मेरी पहचान  क्या है,
हिन्दू-मुसलमान नहीं, बता ये इंसान क्या  है।
क्यों  लहू  की रंग,  हर  कहीं   एक   सी   है।
क्यों सरहदों में जमीं है, ये आसमान क्या है।

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

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