नाम नहीं, मुझे कुछ, मुकाम बनाने है

नाम  नहीं, मुझे कुछ, मुकाम बनाने है,
मुझे इस जमीं को, आसमान बनाने हैं।
बदल    सकूँ    मैं,   सूरतें    तमाम  वो,
जिन्हें     मुझे,  खाश  से आम बनाने हैं।

दबा के रखा था, जिसे सदियों से सिने में,
उसे   फिर    से,    पैगाम    बनाने    हैं।
उतर चूका  है  गर, सब कुछ, मेरे सर से,
आज फिर से मुझे, वो ही, ज़ाम बनाने हैं।

रोते को हँसा दूँ, ये तरकीब बता दे कोई,
मुझे   हँसता   हुआ,  इंसान   बनाने   हैं।
घर ही नहीं, शहर ही नहीं, देश ही नहीं,
मुझे  हर  कहीं  पर, पहचान  बनाने  हैं।

बहुत ख़ामोश हैं वो होंठ, जो मुस्कुराते थे कभी,
उन चहरों पर, फिर से, वही, मुस्कान बनाने हैं।
कभी  जो  निगाहें  चमकतीं  थीं, मुझे देख  कर,
मुझे  उनके  लिए,  इक   रौशनदान  बनाने  हैं।

बेच   सके,   हर    कोई    अपने    ग़मों    को,
मुझे  खरीदारों का, इक ऐसा जहांन बनाने हैं।
अब   तुफानो   का    भी   डर,  नहीं    है  मुझे,
इसीलिए तो मुझे, समंदर में, मकान बनाने हैं।

रोक  सके   ना  कोई,  मुझे   अपनों   से   मिलने  को,
मुझे  ना सरहद, ना दिवार, ना कोई निशान बनाने हैं।
हो जाए  नतमस्तक   हर   कोई,  जो  देखे  मेरी ओर,
मुझे ऐसा, हिन्दुस्तान बनाने हैं।

 मुझे ऐसा, हिन्दुस्तान बनाने हैं।

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

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