मैं अंजान मुसाफ़िर

मैं अंजान मुसाफ़िर,
अजनबियों सा दीखता हूँ।
हर इकट्ठी भीड़ में भी मैं,
कवियों सा दिखता हूँ।

हूँ चमन की धूल, पर,
मंडियों में बिकता हूँ।
हूँ सदियों से स्थूल, पर,
गलियों में दिखता हूँ।

हूँ बारिस की बूंद, मैं,
सागर को सिंचता हूँ।
लेकिन ज्ञानहीनो को मैं
गागर सा दीखता हूँ।

हूँ चंद्र की शीतलता
पर आँखों को चुभता हूँ।
हूँ सूरज सा विकराल,
पर फिर भी मैं डूबता हूँ।

हूँ लड़कपन की कहानी,
हर कानों को खटकता हूँ।
हूँ दीपक की लौ पुरानी,
राहगिरो संग भटकता हूँ।

मैं अंजान मुसाफ़िर,
अजनबियों सा दीखता हूँ।
हर इकट्ठी भीड़ में भी मैं,
कवियों सा दिखता हूँ।

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

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