मुख़्तसर हो निकलें थे

वो  इस  कदर  मुख़्तसर  हो निकलें थे।
क्या  बताऊँ  वो  किधर  को  निकलें थे।
अफ़वाह थी की वो शहर को निकलें थे।
ऐसा  लगा  मानो  वो धर को निकलें थे।

कल तक जो देखकर मुझे मुश्कुराया करते थे।
वो   गैर   नहीं   थे   जो   इधर   को  निकलें  थे।
विफर   पड़े   थे   सब   सितारें   न  जाने   क्यों।
शायद   उनके   अपने   सफ़र  को  निकलें  थे।

उन्हें   डूब     जाने    की    बड़ी    बुरी    आदत    थी।
शायद    इसीलिए    वो    समंदर   को    निकले    थे।
शमा-ए-महफ़िल  नहीं थीं, सब आपस में उलझ पड़े।
इसीलिए     वो     बड़े     बेसबर    हो     निकले     थे।

वो    गए    की   सब   होंठ   खामोश   हो   गए।
शायद    वो    सबके    जुबान   ले   निकले   थे।
इल्ज़ाम लगाता भी तो कौन बड़ी कश्मकश थी।
इसीलिए     सभी    मेहमान    हो    निकले   थे।

लेखक: लोकेश चन्द्र सिंह

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