वो ऐसे शूर वीर थे

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

वो ऐसे शूर वीर थे,
समक्ष न कोई टिक सका।
चले जिधर भी वो उधर,
प्रत्यक्ष ना कोई दिख सका।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

प्रचण्ड ताप, वेग थी,
प्रकाण्ड सैन्य, तीर थे।
क्या ढाल, कृपाण थी,
ब्रह्माण्ड भी अधीर थे।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

कदम कदम थी धैर्य भरे,
कदम कदम वो चल पड़े।
विदित हुआ, ध्वनित हुआ,
वो वज्र थाम, निकल पड़े।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

बही लहू की धार वो,
महालिंग भी चकित हुए।
सिंघ सी दहाड़ देख,
शत्रु सभी भयभीत हुए।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

उधर से देखो यम चले,
जिधर से देखो वीर चले।
वो वीर माहकाल सा,
मृत्यु बाँटते चले।।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

यम खड़ा सहम गया,
रण भी देखो थम गया।
विजय की हर्ष नाद हुई,
धरा ख़ुशी में रम गया।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

हुई प्रसन्न वसुंधरा,
की पाप सारे मिट गए।
वो वीर अपनी माँ से देखो,
कैसे आज लिपट गए।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

वे राणा राण के धीर थे,
महाराणा शूर वीर थे।
कुशल, सुयोग्य योद्धा वे,
वज्र सशरीर थे।

वो ऐसे शूर वीर थे।
वो ऐसे शूर वीर थे।।

लोकेश चन्द्र सिंह

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