जब सूरज की लालिमा

जब सूरज की लालिमा,
भोर भए दस्तक देती है।
घनी अंधेरी रात भी,
इक क्षण में नतमस्तक होती है।
जब चंद्र की शीलतीलता पर,
चांदनी मोहित होती है।
नई नवेली दुल्हन किसी की,
बांहो को शोभित होती है।
जब काली घनघोर बदरिया,
नभ को आगोशित कर लेती है।
कहीं थिरकते मयूरी के नृत्य,
सब को मोहित कर देती है।
जब पवन की छुवन से,
इक सिहरन तन में भर जाती है।
कहीं इशारों ही इशारों में,
प्रियतमा कोई शर्माती है।
इक किरण भी जब पड़ती है,
सब पंछी चहक उठती हैं।
और ओश की सभी बूंदें,
मोतियों सी दमक उठती हैं।
जब सूरज की लालिमा…

लोकेश चन्द्र सिंह

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