ना बोलो मुझे शराबी, बहुत दुःख होता है

ना बोलो मुझे शराबी, बहुत दुःख होता है।
मै शराब को नहीं, अब शराब मुझे पीता है।
हर कहीं मैं यूँ ही बदनाम हो गया हूँ यारों।
मै नहीं, अब शराब मुझे पी कर जीता है।

क्या कहूँ की सूरत-ए-हाल अब दिखया नहीं जाता।
अब मुश्कुरा कर भी हाल-ए-दिल छुपाया नहीं जाता।
दिख जाता मयख़ाना कहीं, और, दो बूंद चख लेता।
मय की सारी बोतलों को कहीं छुपाकर रख जाता।
अब वफ़ा-ए-इश्क़ मेरी इसी उम्मीद में जीता है।

ना बोलो मुझे शराबी, बहुत दुःख होता है।

हो मुमकिन की जान-ए-फ़रमाईश पूरी हो,
शरीक-ए-खाश की हर ख्वाहिश पूरी हो,
न-जाने फिर कब ये जश्न-ए-नुमाईश पूरी हो,
बोतलों की काश सारी गुंजाईश पूरी हो,
इसी उम्मीद-ए-तर ये दिल हरपल जीता है।

ना बोलो मुझे शराबी, बहुत दुःख होता है।

फटेहाल सा ये दिखावा कैसा है
ना पूछो की ये पहनावा कैसा है
कौन नशे में है यह बताना मुश्किल है
दोनों एक-दूसरे की ही मंज़िल है।
कौन कम्बख्त पीये बग़ैर यहाँ जीता है।

ना बोलो मुझे शराबी, बहुत दुःख होता है।

लोकेश चन्द्र सिंह

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