ना सोचो की मैं मुकर जाऊँगा

ना सोचो की मैं मुकर जाऊँगा।
दीवाना हूँ कुछ न कुछ तो कर जाऊँगा।
जो कह रहा हूँ मैं, कहने दे मुझे।
ना कह पाया तो यक़ीनन मर जाऊँगा।

तू पास ना आईं तो जमाना क्या करे।
पता नहीं अब क्या कर गुज़र जाऊंगा।
सफ़र में बस तू ही नहीं है, मैं भी हूँ।
तू जिधर जायेगी, मै भी उधर जाऊंगा।

तोहमत तमाम लगें हैं, शख्शियत पर मेरे।
बस तू मिल जाये, तो सुधर जाऊँगा।
रिस्तेदार तो तमाम हैं मगर आसरा कोई नहीं।
अब तू ही बता दे, की मैं किधर जाऊँगा।

माना कि ये दौर मुश्किलों भरा है।
हो साथ तेरा तो हर दौर से गुजर जाऊंगा।
मगर बेरूखी तेरी मुझे, अब जीने कहाँ देती।
बस एक मुलाकात मुक़र्रर हो जाए, मर जाऊँगा।

लोकेश चन्द्र सिंह

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