इजहार-ए-मुहब्बत

मेरे  ख़्वाब जो कभी आसमानों मे थे अब ज़मीं पर है।
कौन कहता है मै हक़ीक़तों को दरकिनार करता हूँ।
बंद लिफाफों पर कलाम उनके अब भी तकिये तर है।
लो मै कहता हूँ, हाँ मै आज भी उनसे प्यार करता हूँ।

नहीं खौफ़ मुझे जमाने कि ये धौश कहीं और दिखाना।
अरे मै अपाहिज नहीं हूँ जो किसी के बाप से डरूँ।
है ऐलान-ए-इशक मेरी जो उखाड़ना है उखाड़ ले।
हाँ मै कहता हूँ, कि मै आज भी उनसे प्यार करता हूँ।

मुझे तबीयत ने नहीं मेरी किस्मत ने धोखा दिया।
मगर ज़रूरी नहीं कि मै ख्वाब ना देखा करूँ।
है मजाल किसकी जो रोक दे मुझे उन्हे देखने से।
है यह मर्ज़ी मेरी मैं उन्हे देखूँ  या ना देखा करूँ।

सितमगर कौन है अब कोई फर्क नहीं पड़ता।
हर शक्स फिराक में रहता है कि मै कुछ करूँ।
अरे मै गालिबों कि बस्तियों में रहता हूँ तो क्या हुआ।
ये क्या मतलब है कि मैं भीड़ देखूँ और शेर ही पढ़ूँ।

फिर क्या हुआ गर कोई मुझे मुहाजिरों मे गिने।
ज़मीं आसमां नहीं है मगर उनके दिल मे ही तो हूँ।
अरे बेचैनी उनकी भी बढ़ रही है अब रातों मे।
सोचता हूँ अब इजहार-ए-मुहब्बत कर ही तो दूँ।

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

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