यह मत पूछो

मेरे एक तरफ़ा मुहब्बत की बेकरारी मत पूछो।
क्या-क्या छोड़ आया हूँ पीछे यह मत पूछो।
वो मेरे ख़्वाबगाह से ज़रा बाहर क्या निकले।
ज़माना पीछे पड़ा है कुछ और मत पुछो।

कौन कितना गरीब है यह ज़रूरी नहीं।
कौन किसके क़रीब है यह मत पूछो।
सभी को हसरतें थी उन्हें अपनाने की।
अब दीवाना कौन-कौन है यह मत पूछो।

माना दुवाओं पर मुझे कभी यकीन नहीं था।
दहलीज़-ए-दरगाह पर खड़े क्यों हो यह मत पूछो।
तमाम राहें ही ख़त्म हो गई चलते-चलते।
मगर ये सफर क्यों है यह मत पूछो।

अब ख्याल किसका है यह सवाल नहीं।
मगर सवाल कितना है यह मत पूछो।
जब आँखे खुलीं मेरी, तब सब अधूरे थे।
मगर ख़्वाब तो ख़्वाब है आख़िर आगे मत पूछो।

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

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