वो अपनी मैयत खुद ही सजा रही हैं

आज फिर उनमें इक शुरुर सी छा रही है।
अरे वो अपनी मैयत खुद ही सजा रही हैं।
हर शक्श परेशान है यह मंज़र देख कर।
ना जाने क्यों वो ऐसा सितम ढा रही है।

क्या बताऊँ की किस कदर मैं जहांन देखता रहा।
क्या बताऊँ किन निगाहों से आसमान देखता रहा।
उनके दीदार-ए-ख्वाहिश में मैं इसपार बैठा रहा।
यारों वो ईद देखते रहे और मैं रमजान देखता रहा।

ये इतेफ़ाक थी की हम बूढ़े जल्दी हो गए यारों।
मगर दौलत-ए-तज़ुर्बा हमने मेहनत से कमाई है।
जिन्हें सीखना हो इस कारवाँ में शामिल हो जाएँ।
वर्ना हुनर-ए-इश्क़ किसने यहाँ जन्नत से मंगाई है।

अब तुम्हारी मुस्कान में, वो बात नहीं है।
नक़ाब रहने दे अभी दिन है, रात नहीं है।
ना भूल की तू बस चराग़ है, आफताब नहीं है।
बता अब कौन देखेगा तुझे, तू ख्वाब नहीं है।

पहचानो क्या हक़ीक़त है और क्या फ़साना है।
किससे क्या छुपाना है और कितना बताना है।
अगर है हिम्मत तो चले आओ अखाड़े में।
फिर आजमाओ जितना ज़ोर आज़माना है।

लोकेश चन्द्र सिंह

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