मेरे यकिन पर शायद उन्हें भी यकीं था

हर किसी के जुबां पर बस मेरा ही असर था।
वरना मुहब्बत मेरी यूँ सरेआम हो जाते नहीं।
ख़ामोश खड़े थे सभी जिन्हें जमाने का डर था।
वरना इसकदर छुपकर वो इश्क़ फरमाते नहीं।

चल पड़े थे तमाम जिन्हें जाने की जल्दी थी।
वरना महफ़िलें यूँ ही वीरान हो जाते नहीं।
एक उम्र ही गुज़ारी थी इंतेज़ार-ए-मुहब्बत में।
वरना सुख़न यूँ ही ज़िन्दगी से कभी जाते नहीं।

और क्या कहूँ की वो दौर ही क़ातिल था।
वरना वफ़ा-ए-इश्क़ यूँ ही बिखर जाते नहीं।
तरस रहे थे तमाम मानो कुछ पाने की ज़िद थी।
वरना इंतजार में पलकें यूँ ही कभी बिछाते नहीं।

मेरे यकिन पर शायद उन्हें भी यकीं था।
वरना राहों पर उनके यूँ निशां आते नहीं।
बादख्याली ने मेरी यकीनन किया था रुसवा।
वरना बग़ैर मेरे वो दूसरा जहां बसाते नहीं।

लोकेश चन्द्र सिंह

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