रात को ढलते देखा है

आज फिर आसमां पर तारों को चलते देखा है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, रात को ढलते देखा है।

कभी बादलों के ओट में चाँद को छुपते देखा है।
कभी ज़मीं पर, कभी आसमां पर विचरते देखा है।
टीम-टीम करते तारों को हर रात में मैंने देखा है।
रिम झिम गिरते बूंदों को बरसात में मैंने देखा है।

आज फिर आसमां पर तारों को चलते देखा है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, रात को ढलते देखा है।

बिसरे जमाने को मैंने यादों में ढलते देखा है।
जमे-जमाए दीवारों की साख बदलते देखा है।
नन्हे कोमल चीटियों को आग में चलते देखा है।
गड़े मुर्दों को भी मैंने बात बदलते देखा है।

आज फिर आसमां पर तारों को चलते देखा है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, रात को ढलते देखा है।

कभी बुढापे पर जवानी, खूब मचलते देखा है।
उस पीपल के पेड़ के नीचे हाथों को मलते देखा है।
अरे सरकते दुपट्टे पर आँख मचलते देखा है।
हर उम्र को मैंने इन राहों से गुजरते देखा है।
आज फिर आसमां पर तारों को चलते देखा है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, रात को ढलते देखा है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, रात को ढलते देखा है।
लोकेश चन्द्र सिंह

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