यह बात मुसाफ़िर क्या जाने

यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।
हर-बात मुसाफ़िर क्या जाने।

हर-बात मुसाफ़िर क्या जाने।
जज्बात मुसाफ़िर क्या जाने।

यूँ आते-जाते रहते हैं,
यूँ आते-जाते रहते हैं,

दिन-रात मुसाफ़िर क्या जाने।
यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।

यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।
हर-बात मुसाफ़िर क्या जाने।

जब कलियाँ चटकी शाख में,
एक शोर सा छाया हर-कहीं।
सब भवरें दौड़े बाग में,
पर माली आया फिर नहीं।
फिर कलियों की तकलीफें,
फिर कलियों की तकलीफें,
हालात मुसाफ़िर क्या जाने।
यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।

यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।
हर-बात मुसाफ़िर क्या जाने।

कलियों का यौवन भर आया,
और खुश्बू फैली हर-कहीं।
माली का पहरा गहराया,
पर कलियाँ घटती ही रहीं।
लेकिन शाखों और कलियों की,
लेकिन शाखों और कलियों की,
जज़्बात मुसाफ़िर क्या जाने।
यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।

यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।
हर-बात मुसाफ़िर क्या जाने।

जब कोयल कुकी बाग में,
तब आमों का एहसास हुआ।
सब टूटी शाखें बोल उठीं,
रे माली तू क्यूँ उदास हुआ।
लेकिन शाखों और फुलों की,
लेकिन शाखों और फूलों की,
संवाद मुसाफ़िर क्या जाने।
यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।

यह बात मुसाफ़िर क्या जाने।
हर-बात मुसाफ़िर क्या जाने।

लोकेश चन्द्र सिंह

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