वो इशारों ही इशारों में छेड़ जाते हैं।

वो इशारों ही इशारों में छेड़ जाते हैं।
न जाने वो एक आँख क्यों दबाते हैं।

लग जाते हैं वो निशाने की तरह
गुज़र जाते हैं वो ज़माने की तरह
मुशकुरतें हैं हँसाने की तरह
सताते हैं दीवाने की तरह

कई नग्मा मेरे आंसुओं से हो कर गुज़री है।
वो शहर मेरे निगाहों से हो कर गुज़री है।
न जाने वो किधर से हो कर गुज़री है।
अरे वो इन्ही निगाहों से रो रो कर गुज़री है।

ना हकीक़त थी कोई, ना फसाना बनाया गया।
मुहब्बत करते करते यारों, मेरा भी जमाना गया।
फिर मुस्कुराएं क्यूं नहीं, यह बता दे कोई।
मुसीबत भी चली गई, और अफसाना भी चला गया।

हर रोज तबीयत मेरी कुछ यूं मचल जाती है।
तुम्हारे आते ही ना जाने क्यूं संभल जाती है।

ना जी पाए हम की तुमने मिटाने शाजिश की
हमने ना जाने जीने की कितनी कोशिश की
मेरी शौक़ ने मुझे ही सताया है बहुत
अफ़सोस क्या करूं की मैंने ही ये ख्वाहिश की

गर इश्क़ नही होती तो यह सितम भी नही होता
गर तू नही होती तो शायद यह ग़म भी नही होता

लेखक : लोकेश चन्द्र सिंह

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